राजस्थान की विधानसभा - राजस्थान विधान सभा

 

राजस्थान की विधानसभा - राजस्थान विधान सभा

राजस्थान की विधानसभा, भारतीय संविधान के अनुसार राज्य सरकार का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो राज्य के कानूनों, नीतियों और निर्णयों को बनाने और लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस ब्लॉग में हम राजस्थान विधानसभा के गठन, संरचना, कार्य, अर्हताएँ, निरर्हताएँ और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंगे।

अनुच्छेद 168: राज्यों के विधानमण्डलों का गठन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार, प्रत्येक राज्य में विधानमण्डल दो सदनों में बंटा होता है:

  1. उच्च सदन (विधान परिषद)
  2. निम्न सदन (विधानसभा)

राजस्थान विधानसभा राज्य का निम्न सदन है और इसे "राज्य विधानसभा" कहा जाता है। राज्य विधानमण्डल के तीन घटक होते हैं:

  • राज्यपाल (गवर्नर)
  • विधानसभा (निम्न सदन)
  • विधान परिषद (उच्च सदन, यदि अस्तित्व में हो)

भारत के छह राज्यों (कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में द्व chamberात्मक विधानमण्डल होते हैं, जिसमें उच्च सदन (विधान परिषद) और निम्न सदन (विधानसभा) दोनों होते हैं। राजस्थान में अभी विधान परिषद नहीं है, लेकिन 2012 में राज्य विधानसभा ने इसका गठन करने के लिए प्रस्ताव पारित किया था।

राजस्थान में विधान परिषद का उत्सादन (गठन) और समापन

राज्य की विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित करने के बाद, विधान परिषद का गठन संसद के माध्यम से होता है। विधान परिषद का सृजन (गठन) और समापन (उत्सादन) की अंतिम शक्ति संसद के पास होती है। राजस्थान में विधान परिषद के गठन की प्रक्रिया 18 अप्रैल 2012 को राज्य विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित करने के बाद शुरू हुई थी, लेकिन संसद ने अभी तक इस विषय पर कोई विधि पारित नहीं की है।

यदि राजस्थान में विधान परिषद का गठन होता है, तो वहां अधिकतम 66 सीटें हो सकती हैं, जो राज्य विधानसभा सीटों का 33% से अधिक नहीं हो सकतीं। विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है, और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।

विधानसभा की संरचना

राजस्थान विधानसभा की संरचना भारतीय संविधान में तय की गई है। किसी भी राज्य में विधानसभा सीटों की संख्या 60 से 500 तक हो सकती है, लेकिन राजस्थान में विधानसभा में कुल 200 सीटें हैं।

भारत में, राज्य विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 332 के तहत किया गया है।

विधानसभा के सदस्य बनने के लिए अर्हता

राजस्थान विधानसभा के सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित अर्हताएँ होनी चाहिए:

  1. नागरिकता: वह व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. आयु: उसकी आयु कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए।
  3. निर्वाचन आयोग द्वारा प्रमाणित: वह शपथ पत्र प्रस्तुत करके अपनी योग्यता साबित करे।
  4. चुनाव क्षेत्र: वह उस राज्य के निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता होना चाहिए, जहां से वह चुनाव लड़ने जा रहा है।
  5. सरकारी सेवा: वह किसी सरकारी पद पर कार्यरत नहीं होना चाहिए।
  6. अन्य योग्यताएँ: वह भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताओं को पूरा करता हो।

विधानसभा कार्यकाल

राजस्थान विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, जो कि पहले अधिवेशन से प्रारंभ होता है। आपातकाल के दौरान, यदि संसद किसी विधि द्वारा कार्यकाल बढ़ा देती है, तो यह एक वर्ष तक बढ़ सकता है। आपातकाल समाप्त होने के बाद, बढ़ाई गई अवधि 6 महीने तक रह सकती है।

विधानसभा के सदस्यों की निरर्हता (अयोग्यता)

राज्य विधानसभा के सदस्य के रूप में किसी व्यक्ति की अयोग्यता कुछ निम्नलिखित स्थितियों में हो सकती है:

  1. लाभ का पद: यदि वह किसी लाभ के पद पर कार्यरत है (भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन)।
  2. अपराध: यदि उसे किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है, जिसमें उसे 2 साल या उससे अधिक की सजा मिलती हो।
  3. दूसरी नागरिकता: यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या किसी विदेशी राज्य की नागरिकता ले चुका है।
  4. अन्य स्थितियाँ: वह दिवालिया घोषित हो, या मानसिक रूप से विकृत हो और सक्षम न्यायालय द्वारा उसे अयोग्य घोषित किया गया हो।
  5. चुनाव खर्च: यदि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर चुनावी खर्चों का विवरण प्रस्तुत करने में विफल हो।

विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

राजस्थान विधानसभा में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव सदस्यों द्वारा किया जाता है। विधानसभा का अध्यक्ष सदन की कार्यवाही को संचालित करता है और सदन के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है। विधानसभा के कार्यों को नियंत्रित करने में अध्यक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उपाध्यक्ष का कार्य अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही संचालित करना होता है।

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल विधानसभा के कार्यकाल के समान होता है, और इन्हें सामान्य बहुमत से हटाया भी जा सकता है।

विधानसभा सचिवालय (अनुच्छेद 187)

राज्य विधानसभा के कार्यों को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत प्रत्येक राज्य विधानसभा का एक सचिवालय होता है। यह सचिवालय राज्य विधानमण्डल के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदार होता है। इसके कार्यों में विधायी दस्तावेज़ों का रख-रखाव, सदन की बैठकों का आयोजन, और सदस्याओं को आवश्यक सेवाएं प्रदान करना शामिल है।

राजस्थान विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल और हटाने के प्रस्ताव

राजस्थान विधानसभा का अध्यक्ष राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पद होता है। अध्यक्ष का कार्य सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना, विधायी प्रक्रिया को नियंत्रित करना और विधानसभा के नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। राजस्थान में विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल की एक लंबी और दिलचस्प इतिहास है, जिसमें कई प्रमुख व्यक्तित्वों का योगदान रहा है। इस ब्लॉग में हम राजस्थान विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल, हटाने के प्रस्तावों और संबंधित तथ्यों पर चर्चा करेंगे।

राजस्थान विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल

नीचे राजस्थान विधानसभा के प्रमुख अध्यक्षों और उनके कार्यकाल की सूची दी जा रही है:

स.नं. नाम कार्यकाल
1 नरोत्तम लाल जोशी 31.03.1952 से 25.04.1957
2 रामनिवास मिर्धा 25.04.1957 से 03.05.1967
3 निरंजन नाथ आचार्य 03.05.1967 से 20.03.1972
4 राम किशोर व्यास 20.03.1972 से 18.07.1977
5 महारावल लक्ष्मण सिंह 18.07.1977 से 20.06.1979
6 गोपाल सिंह भाद्राजून 25.09.1979 से 07.07.1980
7 पूनम चंद बिश्नोई 07.07.1980 से 20.03.1985
8 हीरालाल देवपुरा 20.03.1985 से 16.10.1985
9 गिरिराज प्रसाद तिवारी 31.01.1986 से 11.03.1990
10 हरिशंकर भाभड़ा 16.03.1990 से 21.12.1993
11 हरिशंकर भाभड़ा 30.12.1993 से 05.10.1994
12 शांतिलाल चपलोत 07.04.1995 से 18.03.1998
13 समर्थ लाल मीणा 24.07.1998 से 04.01.1999
14 परसराम मदेरणा 06.01.1999 से 15.01.2004
15 सुमित्रा सिंह 16.01.2004 से 01.01.2009
16 दीपेंद्र सिंह शेखावत 02.01.2009 से 20.01.2014
17 कैलाश मेघवाल 22.01.2014 से 15.01.2019
18 चन्द्र प्रकाश जोशी 06.01.2019 से 20.12.2023
19 वासुदेव देवनानी 21.12.2023 से वर्तमान

विशेष तथ्य

  • राजस्थान विधानसभा की पहली महिला अध्यक्ष: सुमित्रा सिंह (12वीं विधानसभा में बनीं)
  • राजस्थान विधानसभा के पहले गैर-कांग्रेसी अध्यक्ष: लक्ष्मण सिंह (6ठी विधानसभा में)
  • राजस्थान के सर्वाधिक कार्यकाल वाले विधानसभा अध्यक्ष: रामनिवास मिर्धा (2 बार)
  • राजस्थान के न्यूनतम कार्यकाल वाले विधानसभा अध्यक्ष: समर्थ लाल मीणा (5 महीने)
  • राजस्थान के एकमात्र मुख्यमंत्री जिन्होंने विधानसभा अध्यक्ष का पद भी संभाला: हीरालाल देवपुरा
  • राजस्थान के एकमात्र उपमुख्यमंत्री जिन्होंने विधानसभा अध्यक्ष का पद भी संभाला: हरिशंकर भाभड़ा (2 बार)

अध्यक्षों को हटाने के लिए प्रस्ताव

अब तक राजस्थान विधानसभा में कुल 6 बार अध्यक्ष को हटाने के लिए प्रस्ताव लाए गए हैं। ये प्रस्ताव विभिन्न कारणों से सदन में लाए गए थे, लेकिन किसी भी अध्यक्ष को पद से हटाया नहीं गया। निम्नलिखित हैं कुछ प्रमुख प्रस्ताव:

  1. पहला प्रस्ताव (नरोत्तम लाल जोशी): पहले विधानसभा में नरोत्तम लाल जोशी को हटाने के लिए दो बार प्रस्ताव लाए गए। एक बार जसवंत सिंह और दूसरी बार वेदपाल त्यागी ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

  2. चौथी विधानसभा (निरंजन नाथ आचार्य): इस विधानसभा में एक बार अध्यक्ष निरंजन नाथ आचार्य को हटाने का प्रस्ताव लाया गया।

  3. आठवीं विधानसभा (गिरिराज प्रसाद तिवारी): इस विधानसभा में गिरिराज प्रसाद तिवारी को हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाया गया।

  4. दसवीं विधानसभा (शांतिलाल चपलोत): शांतिलाल चपलोत को हटाने के लिए दो बार प्रस्ताव लाए गए। एक बार जगदीप धनखड़ ने और दूसरी बार लक्ष्मण सिंह रावत और महादेव सिंह रावत ने संयुक्त रूप से प्रस्ताव प्रस्तुत किया।


राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्ष और प्रोटेम स्पीकर: एक अध्ययन

राजस्थान विधानसभा का उपाध्यक्ष और प्रोटेम स्पीकर दोनों ही महत्वपूर्ण पद होते हैं, जिनका उद्देश्य सदन की कार्यवाही में संतुलन बनाए रखना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुनिश्चित करना है। इस ब्लॉग में हम राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्षों, उनके कार्यकाल, विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर के बारे में चर्चा करेंगे।

राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्ष

राजस्थान विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद अध्यक्ष के बाद आता है और इसका कार्य सदन की कार्यवाही में सहायक और संचालन में मदद करना होता है। उपाध्यक्ष की भूमिका न केवल सदन की कार्यवाही में शामिल होती है, बल्कि यह सदस्य के रूप में कार्य करते हुए सदन की विविध प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। नीचे राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्षों और उनके कार्यकाल की सूची दी गई है:

स.नं. नाम कार्यकाल
1 लाल सिंह शक्तिवत 31.03.1952 से 31.03.1957
2 निरंजन नाथ आचार्य 01.05.1957 से 01.03.1962
3 नारायण सिंह मसूदा 07.05.1962 से 28.02.1967
4 पूनम चंद विश्नोई 09.05.1967 से 09.07.1971
5 राम नारायण चौधरी 11.11.1971 से 15.03.1972
6 राम सिंह यादव 25.03.1972 से 30.04.1977
7 राम चन्द्र 08.09.1977 से 17.02.1980
8 अहमद बख्श सिंधी 28.03.1981 से 24.10.1982
9 गिरिराज प्रसाद तिवारी 29.03.1985 से 31.01.1986
10 किशन मोटवानी 28.10.1986 से 01.03.1990
11 यदुनाथ सिंह 05.07.1990 से 21.03.1991
12 हीरा सिंह चौहान 25.03.1991 से 14.12.1992
13 शांति लाल चपलोत 27.09.1994 से 07.04.1995
14 समर्थ लाल मीना 04.05.1995 से 17.07.1998
15 तारा भंडारी 28.07.1998 से 30.11.1998
16 देवेन्द्र सिंह 26.03.1999 से 04.12.2003
17 राम नारायण विश्नोई 19.07.2004 से 10.12.2008
18 राम नारायण मीना 29.02.2012 से 09.12.2013
19 राव राजेंद्र सिंह 18.09.2015 से 15.01.2019

विशेष तथ्य:

  • सबसे लंबा कार्यकाल: पहले तीन उपाध्यक्षों का प्रत्येक 5 वर्षों का कार्यकाल।
  • महिला उपाध्यक्ष: तारा भंडारी (जो महिला उपाध्यक्ष बनीं)।
  • अध्यक्ष और उपाध्यक्ष: निरंजन नाथ आचार्य, पूनम चंद विश्नोई, गिरिराज प्रसाद तिवारी, शांति लाल चपलोत, समर्थ लाल मीना, आदि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पदों पर रहे।

विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर

प्रोटेम स्पीकर का कार्य नवनिर्वाचित विधानसभा के सदस्यों को शपथ दिलाना और चुनावी प्रक्रिया को प्रारंभ करना होता है। यह पद अस्थायी होता है और राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाता है। प्रोटेम स्पीकर का कार्यकाल आमतौर पर बहुत संक्षिप्त होता है, लेकिन इसकी भूमिका विधानसभा के आरंभिक कार्यों में बहुत महत्वपूर्ण होती है।

प्रोटेम स्पीकर के बारे में कुछ तथ्य:

  • प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति: प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और शपथ भी राज्यपाल से ली जाती है।
  • प्रोटेम स्पीकर का कार्य: नवनिर्वाचित सदस्य को शपथ दिलाने का कार्य प्रोटेम स्पीकर का होता है।
  • प्रोटेम स्पीकर का पद विधानसभा में होता है, विधान परिषद में नहीं।
  • सर्वाधिक बार प्रोटेम स्पीकर बनने वाले: पूनम चंद विश्नोई, जो तीन बार प्रोटेम स्पीकर बने।

विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर और विपक्ष के नेता:

राजस्थान विधानसभा में कई प्रमुख व्यक्तित्वों ने प्रोटेम स्पीकर और विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया। यहां कुछ प्रमुख नाम और उनके कार्यकाल दिए जा रहे हैं:

विधानसभा प्रोटेम स्पीकर विपक्ष के नेता
1 महाराव संग्राम सिंह जसवंत सिंह, तन सिंह
2 नारायण सिंह मसूदा नरेंद्र सिंह
3 पूनम चंद विश्नोई लक्ष्मण सिंह
4 यशवंत सिंह नाहर -
5 मेजर फ़तेह सिंह -
6 परसराम मदेरणा -
7 लक्ष्मण सिंह -
8 पूनम चंद विश्नोई -
9 भैरु सिंह शेखावत परसराम मदेरणा, रामनारायण चौधरी
10 गंगाराम चौधरी वसुन्धरा राजे, गुलाब चंद कटारिया
11 देवी सिंह पाटिल रामेश्वर लाल डूडी
12 प्रद्युम्न सिंह गुलाब चंद कटारिया, राजेंद्र राठौड
13 गुलाब चंद कटारिया टीकाराम जूली
14 कालीचरण सराफ जसवंत सिंह, तन सिंह

उल्लेखनीय तथ्य:

  • सर्वाधिक बार प्रोटेम स्पीकर: पूनम चंद विश्नोई (3 बार)।
  • विपक्ष के नेता: गुलाब चंद कटारिया, जिन्होंने सबसे अधिक (3 बार) विपक्ष के नेता का पद संभाला।

यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं:

प्रथम विधानसभा (1952-1957):

  • टीकाराम पालीवाल ने दो सीटों से चुनाव लड़ा—मलारना चोड़ और महुआ। वे दोनों सीटों से जीते, लेकिन बाद में उन्होंने मलारना चोड़ सीट छोड़ दी।
  • हीरालाल शास्त्री ने इस विधानसभा में चुनाव नहीं लड़ा।
  • महिला उम्मीदवार: पहली विधानसभा में 4 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, लेकिन चारों हार गईं:
    1. चिरंजी देवी
    2. वीरेंद्रबाई
    3. शांताबाई
    4. रानी देवी
  • 17 उपचुनाव हुए, जो अब तक का सबसे अधिक संख्या में उपचुनाव थे।
  • यशोदा देवी (प्रजा समाजवादी पार्टी) ने 1953 में बांसवाड़ा उपचुनाव में जीत दर्ज की और राज्य की पहली महिला विधायक बनीं।
  • कमला बेनीवाल (कांग्रेस) राजस्थान की दूसरी महिला विधायक थीं, जिन्होंने 1954 में आमेर से उपचुनाव जीता।
  • 1954 में मोहनलाल सुखाड़िया ने जयनारायण व्यास को हराकर सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड स्थापित किया।
  • 1956 में अजमेर-मेरवाड़ा के राजस्थान में विलय से विधानसभा सीटों की संख्या 190 हो गई।

दूसरी विधानसभा (1957-1962):

  • कुल 176 सीटों पर चुनाव हुए।
  • चुनाव परिणाम: कांग्रेस ने 119 सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि राम राज्य परिषद ने 17 सीटें और भारतीय जनसंघ ने 6 सीटें प्राप्त की।
  • प्रोटेम स्पीकर: नारायण सिंह
  • विधानसभा अध्यक्ष: रामनिवास मिर्धा (जो सबसे लंबे कार्यकाल वाले अध्यक्ष रहे)
  • विधानसभा उपाध्यक्ष: निरंजन आचार्य
  • मुख्यमंत्री: मोहनलाल सुखाड़िया दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

तीसरी विधानसभा (1962-1967):

  • इस विधानसभा में 176 सीटों पर चुनाव हुए और 2 सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र समाप्त कर दिए गए।
  • चुनाव परिणाम:
    • कांग्रेस: 88 सीटें (सबसे बड़ी पार्टी)
    • स्वतंत्र पार्टी: 36 सीटें (दूसरी सबसे बड़ी पार्टी)
    • भारतीय जनसंघ: 15 सीटें
  • विधानसभा अध्यक्ष: रामनिवास मिर्धा
  • मुख्यमंत्री: मोहनलाल सुखाड़िया (कांग्रेस)

चौथी विधानसभा (1967-1972):

  • कुल 184 सीटों पर चुनाव हुए।
  • चुनाव परिणाम:
    • कांग्रेस: 89 सीटें
    • स्वतंत्र पार्टी: 48 सीटें
    • भारतीय जनसंघ: 21 सीटें
  • पहली बार कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया और स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ का दबदबा बढ़ गया।
  • विधानसभा अध्यक्ष: निरंजननाथ आचार्य
  • विधानसभा उपाध्यक्ष: पूनम चंद विश्नोई
  • राष्ट्रपति शासन: डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन केंद्र सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति शासन (13 मार्च, 1967 से 26 अप्रैल, 1967) लागू किया।
  • 9 जुलाई, 1971 को मोहनलाल सुखाड़िया ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया और बरकतुल्ला खान को मुख्यमंत्री बनाया गया।

महत्वपूर्ण घटनाएँ:

  • 1967 में पहली बार राज्यमंत्री और संसदीय सचिव बनाए गए।
  • राष्ट्रपति शासन के कारण मोहनलाल सुखाड़िया ने बहुमत प्राप्त किया।

आपने राजस्थान विधानसभा के इतिहास के बारे में और कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं और आंकड़ों का उल्लेख किया है, जो राज्य की राजनीति और विधानसभा की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है। आइए इसे और विस्तार से समझें:

बरकतुल्ला खान का मुख्यमंत्री पद और इस्तीफा (1972-1977):

  • बरकतुल्ला खान को 1972 में मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन वे विधायक नहीं थे, जिससे उन्हें 6 महीने के भीतर इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा को भंग करना पड़ा। यह घटना राज्य के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पांचवीं विधानसभा (1972-1977):

  • कुल 184 सीटों पर चुनाव हुए।
  • चुनाव परिणाम:
    • कांग्रेस: 145 सीटें
    • स्वतंत्र पार्टी: 11 सीटें
    • भारतीय जनसंघ: 8 सीटें
  • स्पीकर: रामकिशोर व्यास
  • प्रोटेम स्पीकर: यशवंत सिंह नाहर
  • मुख्यमंत्री: बरकतुल्ला खान
    • उनके निधन के बाद, हरिदेव जोशी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला।
  • आपातकाल के कारण विधानसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया, और यह पांचवीं विधानसभा सबसे लंबे कार्यकाल वाली विधानसभा बनी।
  • इस दौरान राजस्थान में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन (30 अप्रैल 1977 से 21 जून 1977 तक) लगाया गया।

छठी विधानसभा (1977-1980):

  • कुल 200 सीटों पर चुनाव हुए।
  • चुनाव परिणाम:
    • जनता पार्टी: 151 सीटें
    • कांग्रेस: 41 सीटें
  • यह राजस्थान में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी, और भैरो सिंह शेखावत राजस्थान के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
  • प्रोटेम स्पीकर: मेजर फतेह सिंह
  • इस विधानसभा में दो स्पीकर चुने गए:
    1. महारावल लक्ष्मण सिंह (राजस्थान के पहले गैर-कांग्रेसी विधानसभा अध्यक्ष)
    2. गोपाल सिंह

सातवीं विधानसभा (1980-1985):

  • छठी विधानसभा 5 साल से पहले ही भंग कर दी गई, और पहले मध्यावधि चुनाव हुए।
  • 1980 में राजस्थान में तीसरा राष्ट्रपति शासन (17 फरवरी 1980 से 5 जून 1980 तक) लगाया गया।
  • अध्यक्ष: पूनम चंद विश्नोई
  • मुख्यमंत्री:
    • जगन्नाथ पहाड़िया
    • शिवचरण माथुर
    • हीरालाल देवपुरा
  • यह विधानसभा मध्यावधि चुनाव के माध्यम से गठित पहली विधानसभा थी।
  • चुनाव परिणाम:
    • कांग्रेस: 133 सीटें
    • भारतीय जनता पार्टी: 32 सीटें
  • प्रोटेम स्पीकर: परसराम मदेरणा

आठवीं विधानसभा (1985-1990):

  • कुल 200 विधानसभा सीटें थीं।
  • चुनाव परिणाम:
    • कांग्रेस: 113 सीटें
    • भारतीय जनता पार्टी: 39 सीटें
  • मुख्यमंत्री:
    • हरिदेव जोशी (दूसरी बार)
    • शिवचरण माथुर (दूसरी बार)
    • हरिदेव जोशी (तीसरी बार)
  • प्रोटेम स्पीकर: लक्ष्मण सिंह
  • इस विधानसभा में हीरालाल देवपुरा और गिरिराज प्रसाद तिवारी स्पीकर रहे।

नौवीं विधानसभा (1990-1992):

  • चुनाव परिणाम:
    • भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक 85 सीटें मिलीं, लेकिन किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।

आपके द्वारा दी गई जानकारी से राजस्थान की विधानसभा के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं और राजनीतिक परिवर्तनों का विवरण मिलता है। आइए इसे और विस्तार से समझते हैं:

जनता दल यूनाइटेड और भैरों सिंह शेखावत (1992-1993)

  • जनता दल यूनाइटेड ने 55 सदस्य के समर्थन से भैरों सिंह शेखावत को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाया।
  • राजस्थान में दूसरी बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
  • स्पीकर: हरिशंकर भाभड़ा
  • प्रोटेम स्पीकर: पूनम चंद विश्नोई
  • राम मंदिर आंदोलन के कारण जनता दल यूनाइटेड ने अपना समर्थन वापस ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप 1992 में राजस्थान में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया (15 दिसंबर 1992 से 3 दिसंबर 1993 तक)।
  • इसके बाद, नौवीं विधानसभा समय से पहले भंग कर दी गई और राज्य में दूसरी बार मध्यावधि चुनाव हुए।

दसवीं विधानसभा (1993-1998)

  • भा.ज.पा. ने 95 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद, भैरों सिंह शेखावत निर्दलीय विधायकों के समर्थन से तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
  • प्रोटेम स्पीकर: पूनम चंद विश्नोई
  • स्पीकर: हरिशंकर भाभड़ा, शांतिलाल चपलोत

ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)

  • कांग्रेस ने 153 सीटें जीतीं, जो राज्य में पहली बार किसी पार्टी को तीन-चौथाई बहुमत दिलाने वाली जीत थी।
  • मुख्यमंत्री: अशोक गहलोत
  • प्रोटेम स्पीकर: भैरों सिंह शेखावत
  • स्पीकर: परसराम मदेरणा
  • ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का पहली बार इस्तेमाल किया गया, हालांकि यह केवल कुछ क्षेत्रों में हुआ था।

बारहवीं विधानसभा (2003-2008)

  • वसुंधरा राजे ने पहली बार भा.ज.पा. को 120 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत दिलाया।
  • प्रोटेम स्पीकर: गंगाराम चौधरी
  • स्पीकर: श्रीमती सुमित्रा सिंह (राजस्थान विधानसभा की पहली महिला स्पीकर थीं)
  • बारहवीं विधानसभा में ईवीएम का पूरा राज्य में इस्तेमाल हुआ था।
  • यह विधानसभा एकमात्र ऐसी विधानसभा थी, जिसमें मुख्यमंत्री, राज्यपाल और स्पीकर तीनों पदों पर महिलाएं थीं।

तेरहवीं विधानसभा (2008-2013)

  • निर्दलीय और बसपा के समर्थन से अशोक गहलोत ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
  • इस विधानसभा में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला
  • स्पीकर: दीपेंद्र सिंह शेखावत
  • इस विधानसभा में सबसे अधिक महिला सदस्य (28) थीं।
  • प्रोटेम स्पीकर: देवी सिंह भाटी

चौदहवीं विधानसभा (2013-2018)

  • भा.ज.पा. ने 163 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद, वसुंधरा राजे सिंधिया को दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई।
  • प्रोटेम स्पीकर: प्रद्युम्न सिंह

आपके द्वारा दी गई जानकारी से राजस्थान विधानसभा के हालिया घटनाक्रमों और महत्वपूर्ण तथ्यों का बहुत ही विस्तृत और सटीक विवरण सामने आता है। आइए इसे और समझते हैं:

पंद्रहवीं विधानसभा (2018-2023)

  • मुख्यमंत्री: अशोक गहलोत (तीसरी बार)
  • चुनाव: 7 दिसंबर 2018 को 199 सीटों के लिए चुनाव हुए, और 12 दिसंबर 2018 को सरकार का गठन हुआ।
  • शपथ ग्रहण: 17 दिसंबर 2018 को अल्बर्ट हॉल में हुआ।
  • स्पीकर: कैलाश मेघवाल
  • डिप्टी स्पीकर: राव राजेंद्र सिंह
  • महिलाओं का प्रतिनिधित्व: 15वीं विधानसभा में कुल 27 महिला विधायक थीं, जिनमें से 4 जोधपुर से थीं। इस विधानसभा में 8 महिला विधायक अनुसूचित जाति और 3 महिला विधायक अनुसूचित जनजाति से थीं।
  • पुनर्मतदान: करणपुर (गंगानगर) सीट पर पीठासीन अधिकारी की गलती के कारण पुनर्मतदान हुआ।
  • ममता भूपेश को एकमात्र महिला राज्य मंत्री नियुक्त किया गया।
  • नई राज्य पार्टी का दर्जा: राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) को राज्य में नई राज्य पार्टी का दर्जा मिला और चुनाव चिन्ह बोतल रहा।

सोलहवीं विधानसभा (2023-2025)

  • चुनाव: 25 नवंबर 2023 को 199 सीटों पर चुनाव हुए, और 5 जनवरी 2024 को उपचुनाव के परिणाम आए।
  • करणपुर सीट पर उपचुनाव: कांग्रेस प्रत्याशी गुरमीत सिंह के निधन के कारण चुनाव स्थगित कर दिया गया था, और 5 जनवरी 2024 को उपचुनाव में रूपेंद्र सिंह कुन्नर ने जीत दर्ज की।
  • मतदाता आंकड़े: कुल मतदाता संख्या 5,26,90,146 थी, जिसमें पुरुष मतदाता 2.75 करोड़ और महिला मतदाता 2.52 करोड़ थे।
  • सर्वाधिक मतदान:
    • ग्रामीण क्षेत्रों में: बांसवाड़ा जिले में सबसे अधिक मतदान (84.32%) हुआ।
    • शहरी क्षेत्रों में: हनुमानगढ़ जिले में सबसे अधिक मतदान (76.65%) हुआ।
  • विजेताओं की आयु:
    • सबसे युवा विधायक रविन्द्र सिंह भाटी (25 वर्ष) बने।
    • सबसे बुजुर्ग विधायक हरिमोहन शर्मा और दीपचंद बैरिया (83 वर्ष) थे।
  • महिला विधायक: 16वीं विधानसभा में कुल 20 महिला विधायक निर्वाचित हुईं, जो विधानसभा के 10 प्रतिशत थे। इसमें 9 कांग्रेस, 9 भाजपा और 2 निर्दलीय महिलाएं शामिल थीं।
  • उपचुनाव: बागीदौरा विधानसभा सीट से महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने इस्तीफा दिया, जिसके बाद उपचुनाव में जयकृष्ण पटेल (BAP) ने जीत हासिल की।

नवीन विधानसभा भवन

  • उद्घाटन: 6 नवंबर 2001 को हुआ।
  • शैली:
    • उत्तर: जयपुर शैली (राज्यपाल के लिए)
    • पूर्व: शेखावाटी शैली (विदेशी प्रतिनिधियों के लिए)
    • पश्चिम: मेवाड़ शैली (विधायकों के लिए)
    • मारवाड़ शैली (आम लोगों के लिए)

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:

  • जैसलमेर विधानसभा क्षेत्र को राजस्थान का सबसे बड़ा विधानसभा क्षेत्र माना गया है।
  • राजस्थान का नाथद्वारा विधानसभा क्षेत्र एक से अधिक जिलों में फैला हुआ है।
  • सरदूलशहर (चूरू) निर्वाचन क्षेत्र को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा प्रथम स्थान दिया गया है।
  • जैसलमेर (2) और प्रतापगढ़ (2) में सबसे कम विधानसभा सीटें हैं।

विधानसभा उपचुनावों और विशेष घटनाएं:

  • 18वीं लोकसभा चुनाव में राजस्थान के 5 विधायक जीते, जिनकी सीटों पर उपचुनाव हुए जिनमें:
    1. हरीश मीणा (कांग्रेस) - देवली-उनियारा विधानसभा
    2. राजकुमार रोत (BAP) - चौरासी विधानसभा
    3. मुरारीलाल मीना (कांग्रेस) - दौसा विधानसभा
    4. बृजेंद्र औला (कांग्रेस) - झुंझुनू विधानसभा
    5. हनुमान बेनीवाल (RLP) - खींवसर विधानसभा



निष्कर्ष

राजस्थान विधानसभा भारतीय लोकतंत्र का एक अहम अंग है, जो राज्य की विधायिका को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विधानसभा के गठन, कार्य, अर्हताएँ, निरर्हताएँ और अन्य प्रक्रियाएँ भारतीय संविधान में बारीकी से निर्धारित की गई हैं, ताकि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को पारदर्शी, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक बनाया जा सके। राजस्थान विधानसभा का कार्य केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि राज्य की जनता के हितों की रक्षा करना भी है।

यह ब्लॉग आपको राजस्थान विधानसभा के बारे में विस्तृत जानकारी देने का उद्देश्य रखता है और इसके कार्यों तथा संरचना को स्पष्ट रूप से समझाने में मदद करेगा।

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