आधुनिक राजस्थान में 1857 की क्रांति विद्रोह

 आधुनिक राजस्थान में 1857 की क्रांति विद्रोह

आधुनिक राजस्थान में 1857 की क्रांति विद्रोह


1857 की क्रांति भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह विद्रोह अंग्रेज़ों के खिलाफ भारतीयों के पहले बड़े संगठित संघर्ष के रूप में उभरा। राजस्थान, जो हमेशा से भारतीय साम्राज्य की शौर्यगाथाओं का केंद्र रहा है, में भी इस क्रांति के गहरे प्रभाव देखने को मिले। इस ब्लॉग में हम राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में हुई 1857 की क्रांति के घटनाओं और संघर्षों की चर्चा करेंगे।

कोटा में विद्रोह

कोटा के शासक रामसिंह द्वितीय

1857 की क्रांति के दौरान कोटा का शासक रामसिंह द्वितीय था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य से सहयोग किया। लेकिन इसके बावजूद, कोटा में विद्रोह की लहर उठी, जो राजस्थान में हुए विद्रोहों में सबसे अधिक प्रभावी और व्यापक थी।

15 अक्टूबर 1857 को विद्रोह का आरंभ

कोटा के क्रांतिकारी सैनिकों ने 15 अक्टूबर 1857 को विद्रोह किया। इस विद्रोह का नेतृत्व मेहराब खाँ और जयदयाल कायस्थ ने किया। वे ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ थे और कोटा की सेना में भी अशांति फैलाने का प्रयास किया।

विद्रोह की घटनाएँ

  • रेजीडेंट मेजर बर्टन और उसके परिवार के सदस्य, जैसे कि दो पुत्र और दो चिकित्सक सैडलर व सेविल काण्टम की हत्या कर दी गई।
  • मेजर बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया गया, जो एक भयावह प्रतीक बन गया।
  • कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को महल में नजरबंद कर दिया गया, और राज्य की 127 तोपों पर कब्जा कर लिया गया।

ब्रिटिश सेना द्वारा आक्रमण

मार्च 1858 में, ब्रिटिश सेना ने मेजर जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में कोटा की सेना पर आक्रमण किया। 30 मार्च 1858 को कोटा पर ब्रिटिश सेना का अधिकार हो गया। इस विद्रोह में करौली के महारावल मदनपाल ने भी मदद की थी। अंततः, मेहराब खाँ और जयदयाल को फांसी दे दी गई, और छह महीने तक क्रांतिकारी सेना के अधीन रहने के बाद कोटा फिर से महाराव के नियंत्रण में आ गया।

मेवाड़ में क्रांति का विस्तार

मेवाड़ के सामंत और महाराणा स्वरूप सिंह

मेवाड़ में अधिकांश सामंत ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे, लेकिन मेवाड़ के शासक महाराणा स्वरूप सिंह ब्रिटिश सत्ता के सहयोगी थे। A.G.G. के निर्देश पर महाराणा स्वरूप सिंह ने मेवाड़ के सभी सामंतों को पत्र भेजकर ब्रिटिश प्रशासन का पालन करने को कहा।

प्रमुख संघर्ष और सहयोग

  • सलूम्बर के रावत केसरीसिंह और कोठरिया के जोधसिंह ने क्रांतिकारियों की मदद की।
  • मेवाड़ में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष था, लेकिन अंग्रेजों के समर्थक राजा भी थे, जिनकी मदद से विद्रोह दबाया गया।

जयपुर में क्रांति का विस्तार

जयपुर का समर्थन

जयपुर में क्रांति के दौरान महाराजा रामसिंह द्वितीय ने ब्रिटिशों का पूरा सहयोग किया। उनके सहयोग के कारण, उन्हें 'सितार-ए-हिंद' की उपाधि दी गई।

करौली में क्रांति का विस्तार

क्रांतिकारियों की सहायता

जब कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को नजरबंद कर लिया गया, तो करौली के शासक मदनपाल ने एक बड़ी सेना भेजी, जिसने महाराव को मुक्त किया। इस सहयोग के बदले, अंग्रेजों ने करौली को 17 तोपों की सलामी दी।

बीकानेर और अन्य क्षेत्रों में क्रांति

बीकानेर में संघर्ष

बीकानेर के सरदार सिंह ने खुद सेना लेकर क्रांतिकारियों को दबाने के लिए राजस्थान से बाहर सिरसा और हिसार में संघर्ष किया। इस मदद के बदले उन्हें अंग्रेजों ने टिब्बी परगने के 41 गाँव उपहार में दिए।

अन्य क्षेत्रों में सहयोग

  • प्रतापगढ़, टोंक और डूंगरपुर में भी अंग्रेज समर्थक शासक थे, जिन्होंने विद्रोह को कुचलने में मदद की।
  • बाँसवाडा और झालवाड़ के शासक भी अंग्रेजों के साथ थे, जिन्होंने क्रांतिकारियों की हरकतों को रोका।

विद्रोह की असफलता के कारण

नेतृत्व और रणनीति की कमी

  • अधिकांश शासकों ने ब्रिटिश सत्ता का पर्याप्त सहयोग किया।
  • क्रांतिकारियों के पास एकजुटता की कमी थी, और उनका नेतृत्व रणनीतिक दृष्टि से कमजोर था।
  • अखिल भारतीय दृष्टिकोण का अभाव था और क्रांतिकारियों के पास धन, रसद और हथियारों की कमी थी।

1857 की क्रांति का परिणाम

तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव

1857 की क्रांति असफल रही, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी। ब्रिटिश संसद ने भारत में शासन को फिर से व्यवस्थित किया, और 1858 में 'भारत शासन अधिनियम' लागू किया। इस अधिनियम के तहत, भारतीय ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया, और भारत का शासन ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया।

निष्कर्ष

1857 की क्रांति ने भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना को जागृत किया और बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गति दी। राजस्थान में इस क्रांति का प्रभाव गहरा था, और यहाँ के शासकों ने विभिन्न तरीके से ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष किया। हालांकि यह विद्रोह असफल हुआ, लेकिन इसने भारतीयों को उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

1857 के बारे में प्रमुख पुस्तकें

  • द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेस 1857 - वी.डी. सावरकर
  • द सिपॉय म्यूटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ 1857 - आर.सी. मजूमदार
  • द ग्रेट रिबेलियन - अशोक मेहता
  • 1857 - एस.एन. सेन
  • राजस्थान रोल इन दा स्ट्रगल ऑफ 1857 - नाधूलाल खड़गावत
  • द म्यूटिनीज इन राजपूताना - प्रिचाई

यह ब्लॉग राजस्थान में 1857 के विद्रोह की घटनाओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है और यह दर्शाता है कि कैसे यह विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते में एक महत्वपूर्ण कदम था।

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