आधुनिक राजस्थान - राजस्थान में राजनैतिक जनजागरण

 आधुनिक राजस्थान - राजस्थान में राजनैतिक जनजागरण

        
आधुनिक राजस्थान - राजस्थान में राजनैतिक जनजागरण





राजस्थान में राजनैतिक जनजागरण का मुख्य उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना और किसानों व जनजातियों के अधिकारों की रक्षा करना था। खासकर ब्रिटिश शासन के दौरान किसानों और जनजातीय समुदायों के साथ होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ इन आंदोलनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

किसान आंदोलन

राजस्थान में ब्रिटिश शासन के दौरान किसान आंदोलनों का प्रमुख कारण था—किसानों पर बढ़ती हुई ज़्यादतियाँ और उनकी आर्थिक स्थिति का बदतर होना। अंग्रेज़ों के शासन में दो प्रमुख प्रकार की ज़मीनें थीं—खालसा और जागीर

  1. खालसा ज़मीन: यह वह ज़मीन थी जो सीधे शासक के नियंत्रण में थी।
  2. जागीर ज़मीन: यह वह ज़मीन थी जो सामंतों और जागीरदारों के नियंत्रण में थी।

ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के बाद किसानों पर विभिन्न प्रकार के कर और ज़ोर-जबरदस्ती की नीतियाँ लागू की गईं, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब हो गई। उदाहरण के तौर पर, नई लगानें और बेगार (जबरन श्रम) ने किसानों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया।

इन नीतियों के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा और कुटीर उद्योग जो पहले काफी जीवंत थे, वे धीरे-धीरे नष्ट हो गए। परिणामस्वरूप, भूमि पर आश्रित जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई, जो किसानों की पहले से दयनीय स्थिति को और भी बदतर बना दी।

इन आंदोलनों ने किसानों के हक में आवाज उठाई और उनकी समस्याओं को राज्य और ब्रिटिश शासकों तक पहुँचाया। धीरे-धीरे यह आंदोलन जन जागरूकता में बदल गए, और किसानों ने अपनी ज़मीन और संसाधनों की रक्षा के लिए संगठित रूप से विरोध करना शुरू कर दिया।

जनजातीय आंदोलन

राजस्थान के जनजातीय समुदायों ने भी ब्रिटिश शासन के दौरान उत्पीड़न का सामना किया था। उनकी ज़मीनें हड़पने और उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से दबाने के खिलाफ जनजातीय समुदायों ने विरोध प्रदर्शन किए। ये आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने और जातिवाद, शोषण और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का एक रूप बन गए।

पत्र-पत्रिकाएँ, संस्थाएँ, और क्रांतिकारी घटनाएँ

इन आंदोलनों के समय में पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पत्रकारिता ने जन जागरूकता बढ़ाने में मदद की और शोषण की घटनाओं को उजागर किया। साथ ही, समाज सुधारकों और क्रांतिकारियों ने आंदोलन की दिशा में सक्रिय रूप से भाग लिया।

आर्य समाज का योगदान

आर्य समाज ने भी समाज में सुधार लाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। समाज को जागरूक करने और अंधविश्वासों के खिलाफ आवाज उठाने में इस संस्था का महत्वपूर्ण हाथ था।

इस प्रकार, राजस्थान में किसान और जनजातीय आंदोलनों, पत्र-पत्रिकाओं, संस्थाओं और समाज सुधारकों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन जागरूकता फैलाने और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।




प्रमुख शब्दावली 

  1. खालसा भूमि - यह वह भूमि थी जो शासक के सीधे नियंत्रण में होती थी।

  2. जागीर भूमि - यह भूमि सामंतों या जागीरदारों के नियंत्रण में होती थी।

  3. भौम भूमि - यह जागीर भूमि थी, जिस पर कोई लगान नहीं लगता था। यह आमतौर पर ज़मीनदारों द्वारा विशेष उद्देश्य से दी जाती थी।

  4. शासन भूमि - यह भूमि पुण्य के उद्देश्य से दी जाती थी, जिसका उद्देश्य धार्मिक कार्यों के लिए भूमि का दान करना होता था।

  5. इनाम भूमि - यह भूमि वेतन के रूप में दी जाती थी और यह आमतौर पर लगानमुक्त होती थी।

  6. डोली / डोहली भूमि - यह भूमि जागीरदार द्वारा दी जाती थी, जो पुण्य के उद्देश्य से होती थी।

  7. पसातिया भूमि - यह भूमि सैन्य या असैन्य सेवा के बदले दी जाती थी। सेवा समाप्त होने के बाद यह भूमि राज्य के नियंत्रण में आ जाती थी।

  8. पीवल भूमि / अदेवमातृक भूमि - यह भूमि वह होती थी जिस पर कुएं, नहर, या ट्यूबवैल से सिंचाई की जाती थी।

  9. डीमडू - यह वह भूमि होती थी जो कुएं के आसपास होती थी।

  10. बीहड़ / कच्छ भूमि - यह भूमि नदी-नालों के पास की भूमि होती थी, जो सामान्यत: सूखी और रेगिस्तानी होती है।

  11. कांकण - यह वह भूमि होती थी जो गाँव के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित होती थी।

  12. गोरमी - यह गाँव के पास स्थित भूमि होती थी।

  13. चर्णाट / गोचर भूमि - यह भूमि पशुओं के चरने के लिए इस्तेमाल होती थी, जिसे चारागाह भूमि भी कहा जाता है।

  14. माल भूमि - यह वह भूमि होती थी, जो उपजाऊ और काली होती है, यानी भूमि जिसमें खेती के लिए उच्च गुणवत्ता की मृदा होती है।

  15. हकत-बकत भूमि - यह वह भूमि होती थी, जो फसल उत्पादन के लिए उपयोग की जाती थी।

  16. मगरा - यह वह भूमि होती थी जो ऊँचे स्थान पर स्थित होती थी।

  17. देवदेध भूमि - यह भूमि मन्दिरों को दान में दी जाती थी।

  18. अग्रहार भूमि - यह भूमि शैक्षिक और धार्मिक उद्देश्यों के लिए दी जाती थी, जैसे गुरुकुलों या मंदिरों के आसपास।

  19. ब्रह्मदेव भूमि - यह भूमि ब्राह्मणों को दी जाती थी, जो धार्मिक कार्यों में लगे होते थे।

  20. तलाई भूमि - यह वह भूमि होती थी जो तालाब के आस-पास स्थित होती थी।

  21. चाही भूमि - यह वह भूमि होती थी, जिनकी सिंचाई नहरों या कुओं से की जाती थी।


प्रमुख अधिकारी -


सहाणे- लगान निर्धारित करने वाला अधिकारी।

आमिल - परगने का राजस्व अधिकारी

प्रमुख बंटाई विधियाँ:

बंटाई विधियाँ भूमि से संबंधित विभिन्न व्यवस्थाएँ हैं, जिनके तहत किसानों को भूमि का उपयोग करने और उपज से संबंधित अधिकार दिए जाते हैं। इन विधियों का उद्देश्य भूमि पर उत्पादित फसलों के लाभ का सही बंटवारा करना था।

  1. गल्लाबक्शी (भाओली) – यह एक प्रकार की बंटाई प्रणाली है जिसमें कृषि उत्पादों का हिस्सा निर्धारित किया जाता था।

  2. रास बंटाई – इस विधि में भूमि के उपयोग और उत्पाद का विभाजन एक निश्चित तरीके से किया जाता है।

  3. लक बंटाई – इसमें भूमि की उपज का बंटवारा भूमि मालिक और किसान के बीच होता है, जो अक्सर एक तय हिस्से के रूप में होता है।

  4. खेत बंटाई – यह एक और विधि है जिसमें खेत की उपज को दोनों पक्षों के बीच विभाजित किया जाता है।

प्रमुख बंटाई पद्धतियाँ:

  1. कनकूत - इस पद्धति में राजस्व का निर्धारण अनुमान के आधार पर किया जाता था।

  2. घूघरी - इसमें प्रति खेत के उत्पादन के आधार पर लगान (राजस्व) निर्धारित किया जाता था।

  3. मसाहत पद्धति - इसमें भूमि के माप (पैमाइश या नाप) के आधार पर लगान निर्धारित किया जाता था।

अन्य अधिकारी:

  1. सायर दरोगा – यह अधिकारी परगने का चुंगीकर (कर वसूलने वाला अधिकारी) होता था।

  2. दाण – चुंगी को सायर कहते थे, जो वसूली से संबंधित था।

  3. मंडपिका – यह अधिकारी चुंगी वसूल करने वाला होता था।

  4. तफेदार – यह अधिकारी गाँव से वसूले गए राजस्व का हिसाब रखने का कार्य करता था।

  5. अडसट्टा – यह जयपुर राज्य में भूमि संबंधित रिकॉर्ड रखने का कार्य करता था।

  6. अघोड़ी – यह वह उपकर था जो चमड़े का कार्य करने वालों से वसूला जाता था।

  7. वर्दा-फरोस्सी – यह लड़के और लड़कियों के विक्रय पर वसूला जाने वाला कर था।

  8. चौधान – यह कोटा में मानव के क्रय-विक्रय पर वसूला जाने वाला कर था।

  9. घरियाना / घरेची – यह एक प्रकार का कर था जो विधिवत विवाह के बिना स्त्री को अपने घर में रखने पर लिया जाता था।

  10. आकसी – जोधपुर राज्य में कारावास (सजा) का नाम था।

  11. पंचकुल – यह एक सामाजिक और राजनीतिक संस्था होती थी जो सामाजिक विवादों का निपटारा करती थी।

लाग बाग:

लाग बाग वह अतिरिक्त कर होता था जो भू-राजस्व के अलावा वसूला जाता था। इसे दो श्रेणियों में बांटा जाता था:

  1. नियमित – इस प्रकार के कर की राशि पहले से निर्धारित होती थी।

  2. अनियमित – इस प्रकार के कर की राशि कभी तय नहीं होती, यह बदलती रहती थी।

प्रमुख लाग-बाग:

  1. सिंगोटी – मवेशी के क्रय-विक्रय पर ली जाने वाली लाग।

  2. जाजम – भूमि के विक्रय के समय ली जाने वाली लाग।

  3. चंवरी लाग – विवाह के अवसर पर ली जाने वाली लाग।

  4. न्योता लाग – जागीरदार के लड़के-लड़की के विवाह पर वसूली जाने वाली लाग।

  5. कुंवर जी का घोडा लाग – घोडा खरीदने के लिए ली जाने वाली लाग।

  6. खिचड़ी लाग – सेना के भोजन के लिए वसूला जाने वाली लाग।

  7. अंगलाग – यह पांच वर्ष से ऊपर आयु होने पर वसूला जाता था।

  8. बकरा लाग – बकरे के लिए ली जाने वाली लाग।

  9. मलवा – यह फसल की सुरक्षा के लिए ली जाने वाली लाग थी।

  10. दस्तूर – यह वह अवैध लाग थी जिसे राज्य के राजस्व अधिकारियों द्वारा वसूला जाता था।

यह सारी जानकारी राजस्थान की भूमि व्यवस्था, कराधान और प्रशासनिक व्यवस्था की विस्तृत व्याख्या देती है।




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